सतत कृषि 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

समाचार में

  • राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) कुशल जल उपयोग, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और लचीली कृषि पद्धतियों के माध्यम से सतत एवं जलवायु-प्रतिरोधी कृषि को बढ़ावा दे रहा है।

सतत कृषि

  • इसका अर्थ है भोजन का निरंतर उत्पादन करना बिना पर्यावरण या पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुँचाए।
  • यह मृदा उत्पादकता बनाए रखने और किसानों को दीर्घकाल में संसाधनों, इनपुट्स एवं श्रम का सतत प्रबंधन सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

सतत कृषि का महत्व

  • खाद्य सुरक्षा: प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए दीर्घकालीन उत्पादकता सुनिश्चित करती है।
  • जलवायु प्रतिरोधक क्षमता: सूखा, बाढ़ और गर्मी की लहरों का सामना करने की क्षमता विकसित करती है।
  • जीविकोपार्जन: भारत की लगभग 46% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है।
  • पर्यावरण संरक्षण: मृदा अपरदन, भूजल क्षय और रासायनिक प्रदूषण को कम करती है।
  • वैश्विक नेतृत्व: भारत द्वारा मिलेट्स (“श्री अन्न”) को बढ़ावा देना जलवायु-प्रतिरोधी फसलों का उदाहरण है।

चुनौतियाँ

  • मृदा स्वास्थ्य में गिरावट: उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से कार्बनिक कार्बन स्तर घटा है।
  • जल संकट: अत्यधिक भूजल दोहन और सीमित सिंचाई कवरेज।
  • छोटे भूखंड: विखंडित खेत यंत्रीकरण और आधुनिक तकनीकों के अपनाने में बाधा डालते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: चरम मौसम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति।
  • बाज़ार एवं ऋण तक पहुँच: छोटे किसान उचित मूल्य और संस्थागत ऋण पाने में संघर्ष करते हैं।

सरकारी कदम

  • भारत सरकार ने 2014–15 में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) शुरू किया ताकि कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का समाधान किया जा सके और दीर्घकालीन खाद्य एवं आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित हो।
  • 2018–19 से NMSA को हरित क्रांति- कृषोन्नति योजना के अंतर्गत उप-मिशन बनाया गया और 2022–23 से इसे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PMRKVY) में समाहित किया गया ताकि जलवायु-प्रतिरोधी एवं सतत कृषि को सुदृढ़ किया जा सके।
  • NICRA (जलवायु-लचीली कृषि में राष्ट्रीय नवाचार): जलवायु-प्रतिरोधी किस्में, अंतरफसल प्रणाली, कृषि वानिकी, शून्य-जुताई बुवाई।

सुझाव

  • कृषि-पर्यावरणशास्त्र को बढ़ावा: औद्योगिक खेती से पर्यावरण-अनुकूल पद्धतियों की ओर बदलाव।
  • जल-स्मार्ट खेती: सूक्ष्म सिंचाई और वर्षा जल संचयन का विस्तार।
  • डिजिटल कृषि: AI, IoT और ड्रोन का उपयोग कर सटीक इनपुट प्रबंधन।
  • विविधीकरण: दालें, तिलहन और मिलेट्स को प्रोत्साहित कर धान एवं गेहूँ पर निर्भरता कम करना।
  • किसान सहकारी समितियाँ: FPOs (किसान उत्पादक संगठन) को सशक्त कर बेहतर सौदेबाजी क्षमता।
  • क्षमता निर्माण: किसानों को सतत पद्धतियों और जलवायु अनुकूलन में प्रशिक्षण।

निष्कर्ष

  • सतत कृषि भारत के पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए आवश्यक है। सरकार ने इसे नीतियों, सब्सिडियों और प्रौद्योगिकी-आधारित पहलों के माध्यम से बढ़ावा दिया है।
  • हालाँकि, दीर्घकालीन सफलता पर्यावरण-अनुकूल खेती के विस्तार, छोटे किसानों के समर्थन और आधुनिक तकनीक को पारंपरिक ज्ञान के साथ संयोजित करने पर निर्भर करती है।
  • एक संतुलित रणनीति जिसमें नीति समर्थन, नवाचार और सामुदायिक सहभागिता शामिल हो, भारत में उत्पादक, लचीली और सतत कृषि प्राप्त करने की कुंजी है।

Source:TH 

 

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